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Tuesday, December 1, 2009

The Sweetest Little Magenta Flower Girl

By A. Surekha Rao

Hey Guys,

I thought I must share this exqusite experience I had this morning while returning from my morning walk, I came across this little girl standing by a flower plant outside what could have been her house. She might not have been more than four mind you.

Like I usually do when I see little kids, I tried to catch her eye and smile and say hello. Guess what ? This benevolent little girl beat me to it! Even before I could smile nd say hello...this little girl plucked a magenta flower,reached out with her tiny hand and gave me the flower with a most beautiful and radiant smile on her face.

I was not expecting something this exquisite to happen to me so i took an extra split second to take in the situation. My heart just melted at this exquisite gesture this little girl made to me. I took the flower with my eyes almost misting and hugged the sweetest little girl in the whole world. I was amazed at her incredible generosity of spirit at age four !!! I instantly fell in love with her.

This incident whose fragrance will not leave me till I die made me think...
What made a little girl reach out and give a flower to a veritable stranger?
Is it due to an innate fearlessness born out of innate love and trust ?

I am known amongst my friends as a very very freindly person but the sweet little flower girl made me realie that I am freindly only with firends or acquaintances!
I am wary of strangers and very suspicious of approaching strangers.

I wondered ....have we forgotten to trust? have we forgotten to reach out and be nice? have we forgetten to make a sweet gesture without expecting anything in return? have we forgotten to smile or be nice to strangers because we fear the consequences which are largely imaginary in nature? would the world be a better place if we exchanged smiles with strangers?

The sweetest little magenta flower girl taught me that if we make a sincere and a sweet gesture out of complete trust and generosity of spirit, then our gesture might almost always be reciprocated.

Thursday, November 26, 2009

क्या फर्क है प्रिंट और वेब पत्रकारिता ?

दिलीप मंडल

वेब इस समय दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता मीडियम है। लेकिन सवाल ये है कि क्या कभी ऐसा समय आएगा जब वेब पत्रकारिता प्रिंट को रिप्लेस कर देगी। यानी क्या आप ऐसे समय की कल्पना कर सकते हैं जब आप समाचारों के लिए पूरी तरह से वेब पर निर्भर हो जाएं।


शायद हां और शायद नही।


दरअसल वेब तेजी से जरूर बढ़ रहा है लेकिन भारत जैसे देश में जहां इस समय ब्राडबैंड के सिर्फ ७० लाख ग्राहक हैं, वहां इंटरनेट को एक लंबा सफर तय करना होगा। अभी विश्वसनीयता से लेकर पहुंच में प्रिंट पत्रकारिता काफी आगे है। अभी भी भारत में लिखे हुए शब्द की महत्ता निर्विवाद रूप से ज्यादा है और वेब को वो स्थिति हासिल करने में काफी मशक्कत करनी होगी।

Sunday, November 22, 2009

डॉ. अंबेडकर नहीं पढ़ पाए थे जो भाषण, क्या वही है भारत की मुक्ति का मार्ग?


शेष नारायण सिंह

(क्या मायावती जाति के विनाश के ऐतिहासिक कार्यभार को पूरा करने का बीड़ा उठाएंगी। पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार और समाजवाद के अध्येता शेष नारायण सिंह के विचार। उनसे sheshji@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

पिछली सदी के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन के जानकारों में डा. बीआर अंबेडकर का नाम बहुत ही सम्मान के साथ लिया जाता है। महात्मा गांधी के समकालीन रहे अंबेडकर ने अपने दर्शन की बुनियादी सोच का आधार जाति प्रथा के विनाश को माना था. उनको विश्वास था कि जब तक जाति का विनाश नहीं होगा, तब तक न तो राजनीतिक सुधार लाया जा सकता है और न ही आर्थिक सुधार लाया जा सकता है। दर असल डॉ बी आर अंबेडकर उन पांच ऐसे लोगों में हैं जिन्होंने भारत के बीसवीं सदी, के इतिहास की दशा तय की.

जाति के विनाश के सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाली उनकी किताब,The Annihilation of caste , ने हर तरह की राजनीतिक सोच को प्रभावित किया. है..आज सभी पार्टियां डॉ अंबेडकर के नाम की रट लगाती हैं लेकिन उनकी बुनियादी सोच से बहुत बड़ी संख्या में लोग अनभिज्ञ हैं.सच्चाई यह है कि पश्चिम और दक्षिण भारत में सामाजिक परिवर्तन के जो भी आन्दोलन चले हैं उसमें इस किताब का बड़ा योगदान है. यह काम महाराष्ट्र में उन्नीसवीं सदी में ज्योतिबा फुले ने शुरू किया था . उनके बाद के क्रांतिकारी सोच के नेताओं ने उनसे बहुत कुछ सीखा .. डॉ अंबेडकर ने महात्मा फुले की शिक्षा संबंधी सोच को परिवर्तन की राजनीति के केंद्र में रख कर काम किया और आने वाली नस्लों को जाति के विनाश के रूप में एक ऐसा गुरु मन्त्र दिया जो सही मायनों में परिवर्तन का वाहक बनेगा. डॉ अंबेडकर ने ब्राह्मणवाद के खिलाफ शुरू किये गए ज्योतिबा फुले के अभियान को एक अंतर राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य दिया.

सत्ता और अंबेडकर के सिद्धांत

The Annihilation of caste में डा.अंबेडकर ने बहुत ही साफ शब्दों में कह दिया है कि जब तक जाति प्रथा का विनाश नहीं हो जाता समता, न्याय और भाईचारे की शासन व्यवस्था नहीं कायम हो सकती। जाहिर है कि जाति व्यवस्था का विनाश हर उस आदमी का लक्ष्य होना चाहिए जो अंबेडकर के दर्शन में विश्वास रखता हो। अंबेडकर के जीवन काल में किसी ने नहीं सोचा होगा कि उनके दर्शन को आधार बनाकर राजनीतिक सत्ता हासिल की जा सकती है। लेकिन आज उत्तर प्रदेश में जो सरकार कायम है, उसके बारे में माना जाता है कि वह अंबेडकर के समर्थकों और उनके अनुयायियों की है। राज्य की मुख्यमंत्री और उनके राजनीतिक गुरू कांशीराम ने अपनी राजनीति के विकास के लिए अंबेडकर का सहारा लिया और आज सत्ता उनके पास है। इस बात की पड़ताल करना दिलचस्प होगा कि अंबेडकर के नाम पर सत्ता का सुख भोग रही सरकार ने उनके सबसे प्रिय सिद्धांत को आगे बढ़ाने के लिया क्या कदम उठाए है।


उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री की पिछले पंद्रह वर्षों की राजनीति पर नज़र डालने से प्रथम दृष्टया ही समझ में आ जाता है कि उन्होंने जाति प्रथा के विनाश के लिए कोई काम नहीं किया है। बल्कि इसके उलट वे जातियों के आधार पर पहचान बनाए रखने की पक्षधर है। दलित जाति को अपने हर सांचे में फिट रखने के लिए तो उन्होंने छोड़ ही दिया है अन्य जातियों को भी उनकी जाति सीमाओं में बांधे रखने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान चला रही हैं। हर जाति का भाईचारा कमेटियाँ बना दी गई हैं और उन कमेटियों को मुख्यमंत्री मायावती की राजनीति पार्टी का कोई बड़ा नेता संभाल रहा है। डाक्टर साहब ने साफ कहा था कि जब तक जातियों के बाहर शादी ब्याह की स्थितियां नहीं पैदा होती तब तक जाति का इस्पाती सांचा तोड़ा नहीं जा सकता। चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजने वाली मायावती जी ने एक बार भी सरकारी स्तर पर ऐसी कोई पहल नहीं की जिसकी वजह से जाति प्रथा पर कोई मामूली सी भी चोट लग सके। जाहिर है जब तक समाज जाति के बंधन के बाहर नहीं निकलता आर्थिक विकास का लक्ष्य भी नहीं हासिल किया जा सकता।

एक अजीब बात यह भी है कि मायावती सरकार के कई मंत्रियों को यह भी नहीं मालूम है कि अंबेडकर के मुख्य राजनीतिक विचार क्या हैं उनकी सबसे महत्वपूर्ण किताब का नाम क्या है। यह ठीक वैसा ही है जैसे कम्युनिस्ट पार्टी का कोई नेता मार्क्स के सिद्धांतों को न जानता हो, या दास कैपिटल नाम की किताब के बारे में जानकारी न रखता हो। उनकी सबसे महत्वपूर्ण किताब The Annihilation of caste के बारे में यह जानना दिलचस्प होगा कि वह एक ऐसा भाषण है जिसको पढ़ने का मौका उन्हें नहीं मिला लाहौर के जात पात तोड़क मंडल की और से उनको मुख्य भाषण करने के लिए न्यौता मिला। जब डाक्टर साहब ने अपने प्रस्तावित भाषण को लिखकर भेजा तो ब्राहमणों के प्रभुत्व वाले जात-पात तोड़क मंडल के कर्ताधर्ता, काफी बहस मुबाहसे के बाद भी इतना क्रांतिकारी भाषण सुनने कौ तैयार नहीं हुए। शर्त लगा दी कि अगर भाषण में आयोजकों की मर्जी के हिसाब से बदलाव न किया गया तो भाषण हो नहीं पायेगा। अंबेडकर ने भाषण बदलने से मना कर दिया। और उस सामग्री को पुस्तक के रूप में छपवा दिया जो आज हमारी ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा है।

इस पुस्तक में जाति के विनाश की राजनीति और दर्शन के बारे में गंभीर चिंतन भी है और विमर्श भी। और इस देश का दुर्भाग्य है कि आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास का इतना नायाब तरीका हमारे पास है, लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है। डा- अंबेडकर के समर्थन का दम ठोंकने वाले लोग ही जाति प्रथा को बनाए रखने में रूचि रखते है हैं और उसको बनाए रखने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। जाति के विनाश के लिए डाक्टर अंबेडकर ने सबसे कारगर तरीका जो बताया था वह अंर्तजातीय विवाह का था, लेकिन उसके लिए राजनीतिक स्तर पर कोई कोशिश नहीं की जा रही है, लोग स्वयं ही जाति के बाहर निकल कर शादी ब्याह कर रहे है, यह अलग बात है।

इस पुस्तक में अंबेडकर ने अपने आदर्शों का जिक्र किया है। उन्होंने कहा कि जातिवाद के विनाश के बाद जो स्थिति पैदा होगी उसमें स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा होगा। एक आदर्श समाज के लिए अंबेडकर का यही सपना था। एक आदर्श समाज को गतिशील रहना चाहिए और बेहतरी के लिए होने वाले किसी भी परिवर्तन का हमेशा स्वागत करना चाहिए। एक आदर्श समाज में विचारों का आदान-प्रदान होता रहना चाहिए।
अंबेडकर का कहना था कि स्वतंत्रता की अवधारणा भी जाति प्रथा को नकारती है। उनका कहना है कि जाति प्रथा को जारी रखने के पक्षधर लोग राजनीतिक आजादी की बात तो करते हैं लेकिन वे लोगों को अपना पेशा चुनने की आजादी नहीं देना चाहते इस अधिकार को अंबेडकर की कृपा से ही संविधान के मौलिक अधिकारों में शुमार कर लिया गया है और आज इसकी मांग करना उतना अजीब नहीं लगेगा लेकिन जब उन्होंने उनके दशक में में यह बात कही थी तो उसका महत्व बहुत अधिक था। अंबेडकर के आदर्श समाज में सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है, बराबरी ब्राहमणों के अधियत्य वाले समाज ने उनके इस विचार के कारण उन्हें बार-बार अपमानित किया। सच्चाई यह है कि सामाजिक बराबरी के इस मसीहा को जात पात तोड़क मंडल ने भाषण नहीं देने दिया लेकिन अंबेडकर ने अपने विचारों में कहीं भी ढील नहीं होने दी।

तकलीफ तब होती है जब उसके अनुयायियों की सरकार में भी उनकी विचारधारा को नजर अंदाज किया जा रहा है। सारी दुनिया के समाज शास्त्री मानते हैं कि जाति प्रथा भारत के आर्थिक, सामाजिक और राजनीति क विकास में सबसें बड़ा रोड़ा है है, और उनके विनाश के लिए अंबेडकर द्वारा सुझाया गया तरीका ही सबसे उपयोगी है जरूरत इस बात की है कि सभी राजनीतिक पार्टियां इसको अपना मुद्दा बनाए और मायावती को चाहिए कि इस आन्दोलन को नेतृत्व प्रदान करें।

Thursday, November 19, 2009

मेरिट में आगे, जिंदगी में पीछे!


कल आईआईएमसी में इस बात पर चर्चा हुई कि लड़कियां जीवन के विविध क्षेत्रों में टॉप पर क्यों नहीं हैं। जबकि 10वीं और 12वीं की कक्षाओं में वो बेहतरीन प्रदर्शन करती हैं। सीबीएसई के तमाम पिछले नतीजे इस बात की पुष्टि करते हैँ। इस बारे में पूजा मीणा, स्नेहा शर्मा, लता कश्यप, आशिमा, स्मिता मुग्धा और अमृता सिंह ने विचार रखे और बताया कि किस तरह सामाजिक आर्थिक और मनोवैज्ञानिक कारणों से वो शिखर पर पहुंचने से रह जाती हैं।

Tuesday, November 17, 2009

रिजर्वेशन: उम्र में छूट किसे चाहिए?


दिलीप मंडल

(ये लेख नवभारत टाइम्स के संपादकीय पन्ने पर मुख्य लेख के रूप में छप चुका है। आप भी देखिए।)
यूपीएससी और कई और सरकारी संस्थान तथा एजेंसियां नौकरियों में खास समुदायों को उम्र में छूट देती है। ऐसी ही छूट एंट्रेंस और कंपिटिटिव एक्जाम के लिए अटैंप्ट में भी मिलती है। यूपीएससी के सिविल सर्विस एक्जाम में दलित और आदिवासी कैंडिडेट को अपर एज लिमिट में पांच साल की और ओबीसी कैंडिडेट्स को तीन साल की छूट मिलती है। जबकि जनरल कटेगरी का कैंडिटेट 30 साल की उम्र पूरी करने के बाद ये परीक्षा नहीं दे सकता। दलित और आदिवासी कैंडिडेट के लिए सिविल सर्विस एक्जाम में अटैंप्ट्स की कोई सीमा नहीं है जबकि ओबीसी के कैंडिडेट सात बार इस परीक्षा में बैठ सकते हैं। वहीं जनरल कटेगरी के कैंडिडेट चार बार ही ये परीक्षा दे सकते हैं।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में इस बात पर सवाल उठाया गया है कि दलित, आदिवासी और ओबीसी कैंडिटेट्स को यूपीएससी सिविल सर्विस एक्जाम के लिए ज्यादा अटैंप्ट की इजाजत क्यों दी जाती है। अब सुप्रीम कोर्ट ने यूपीएससी से पूछा है कि ओबीसी कैंडिडेट को सात बार ये परीक्षा देने की इजाजत क्यों मिलनी चाहिए। दरअसल हाई कोर्ट ने इस पिटिशन को ये कहकर खारिज कर दिया था कि पिछड़े वर्गों को ज्यादा अटैंप्ट्स के लिए मौका देना गलत नहीं है क्योंकि संविधान की धारा 16(4) का मकसद ही ये है कि अवसर की समानता सुनिश्चित की जाए और सामाजिक कारणों से जो समुदाय पीछे रह गए हैं उन्होंने सरकारी नौकरियों में पर्याप्त मौके दिए जाएं।
पहली नजर में तो ये व्यवस्था दलितों, आदिवासियों और अन्य पिछड़ों वर्गों के हित में दिखती है कि उन्हें ज्यादा बार परीक्षा देने के मौके मिलते हैं, ज्यादा उम्र होने तक मौके मिलते रहते हैं। इस मामले में भारतीय राज्य व्यवस्था उनके प्रति उदारता बरतती दिखती है। लेकिन क्या सचमुच ये व्यवस्था उन समुदायों के हित में है? दरअसल इस व्यवस्था का नतीजा क्या होता है? क्या उम्र और अटैंप्ट में छूट से वंचित समुदायों का वाकई भला हो रहा है? और अगर ऐसी कोई छूट न दी जाए तो क्या वंचित समुदायों का नुकसान हो जाएगा?
सबसे पहले अगर आखिरी सवाल पर विचार करें तो इस छूट के न होने पर भी इन समुदायों से चुनकर आने वाले कैंडिडेट्स की कुल संख्या पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। मिसाल के तौर पर इस साल सिविल सर्विस एक्जाम के बाद अगर 580 कैंडिडेट का सलेक्शन होना है तो संवैधानिक प्रावधानों के हिसाब से ये तय है कि इनमें से कितने कैंडिडेट दलित, आदिवासी या ओबीसी कटेगरी के होंगे। इस संख्या पर इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि कितने कैंडिडेट ने किस उम्र में ये एक्जाम दिया है या फिर उनका ये कौन सा अटैंप्ट था। दलित, आदिवासी या ओबीसी कटेगरी में टैलेंट पूल अब उतना बड़ा है कि हर साल हजारों कैंडिडेट इस परीक्षा को पास कर सकते हैं। लेकिन सीट सीमित होने के कारण उनमें से जिनका परफॉर्मेंस बेहतर है, उनका सलेक्शन होता है। यानी अगर इन समुदायों के कैंडिडेट्स को उम्र या अटेंप्ट में कोई छूट न मिले तो भी सिविल सर्विस में इनकी संख्या पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
लेकिन उम्र और अटैंप्ट में छूट से एक फर्क पड़ता है। वो फर्क ये है कि इन समुदाय के अफसर अगर सर्विस को बड़ी उम्र में ज्वाइन करते हैं तो उनके लिए ब्यूरोक्रेसी के टॉप पदों पर पहुंच पाना असंभव है। भारत सरकार में रिटायरमेंट की उम्र 60 साल है और इस मामले में दलित, आदिवासी, ओबीसी या जनरल कटेगरी में कोई फर्क नहीं किया गया है। यानी अलग अलग उम्र में सर्विस ज्वाइन करने वाले अफसर एक ही उम्र में रिटायर होंगे। इसे इस तरह समझा जा सकता है कि अगर कोई दलित अफसर 35 साल की उम्र में सर्विस ज्वाइन करता है तो उसके पास नौकरी करने के लिए सिर्फ 25 साल होंगे। जबकि जनरल कटेगरी के कैंडिडेट के पास नौकरी के कम से कम 30 साल होंगे क्योंकि वो 30 साल की उम्र के बाद यूपीएससी सिविल सर्विस की परीक्षा नहीं दे सकता।
नौकरशाही में आखिर के पांच साल की सिनियॉरिटी बेहद महत्वपूर्ण होती है क्योंकि कैबिनेट सचिव से लेकर मंत्रालयों के सचिव और राज्यों के प्रमुख सचिव जैसे सबसे बड़े पदों पर एक एक साल की सिनियॉरिटी से फर्क पड़ जाता है। सही उम्र में सिविल सर्विस ज्वाइन करना टॉप पर पहुंचने के लिए बेहद जरूरी है और उम्र में मिलने वाली छूट चाहे पहली नजर में लुभावनी नजर आए, लेकिन इसका कुल असर ये होता है कि ब्यूरोक्रेसी के शिखर पर वंचित समुदायों के लोगों की उपस्थिति कम होती है।
क्या ये किसी साजिश का हिस्सा है? इसका कोई प्रमाण नहीं है। हालांकि ये भी सच है कि आंबेडकर से लेकर किसी भी दलित चिंतक ने नौकरियों में उम्र की छूट मांगी हो, इसका प्रमाण नहीं मिलता। ये छूट क्यों शुरू हुई और इसके पीछे तर्क क्या रहे होंगे ये शोध का विषय है। ये संभव है कि आजादी के तुरंत बाद इन समुदायों का टेलेंट पूल छोटा होगा और इस वजह से ये छूट देनी पड़ी हो। लेकिन अब तो ये स्थिति नहीं है। मिसाल के तौर पर 14 जुलाई को राज्य सभा में पूछे गए एक सवाल के जवाब में मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से जवाब दिया गया कि इस साल आईआईटी में 1493 ओबीसी, 1265 दलित और 659 आदिवासी चुने गए। आईआईटी जैसी मुश्किल परीक्षा पास करने वालों के लिए यूपीएससी का इम्तेहान पास करना मुश्किल नहीं हो सकता। और ये संख्या सिर्फ आईआईटी की है। इसके अलावा आईआईएम से लेकर केंद्रीय और राज्यों के विश्वविद्यालयों और तकनीकी शिक्षा संस्थानों में अब इन समुदायों के लाखों छात्र हाइयर एजुकेशन हासिल कर रहे हैं और प्रोफेसर से लेकर नामी इंस्टिट्यूट में डायरेक्टर तक बन रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय नौकरियों में उम्र और अटैंप्ट की छूट इन समुदायों के कैंडिडेट का मनोबल कम करती है। जाति से अगर टेलेंट तय नहीं होता और असमानता सिर्फ इस वजह से है कि सबको समान अवसर नहीं मिले तो फिर रिजर्वेशन सिर्फ उस असमानता को दूर करने का माध्यम होना चाहिए। जाति के आधार पर दी जाने वाली कथित सुविधा अगर टैलेंट को दबाने का जरिया बन जाए, मनोवैज्ञानिक बाधा बन जाए या तरक्की में अड़चन बन जाए तो उससे छुटकारा पाने की कोशिश होनी चाहिए। शायद हम ये समझ सकते हैं कि उस कैंडिडेट की मानसिक स्थिति कैसी होती होगी जो सातवीं बार या उससे भी ज्यादा बार एक इम्तेहान दे रहा हो और हर बार रेस में पीछे रह जाता हो? ये अनुभव किसी को भी मनोवैज्ञानिक स्तर पर कमजोर और लाचार बना सकता है।
जाहिर है एज लिमिट और अटैंप्ट मे छूट का कोई तर्क अगर पहले कभी था भी तो उनका आधार खत्म हो चुका है। अब ये छूट इन समुदायों के गले का फंदा ही साबित हो रही है। अगर ये छूट खत्म होती है तो ब्यूरोक्रेसी के ऊंचे पदों पर भी दलित, आदिवासी और ओबीसी की उपस्थिति बेहतर होगी।

Tuesday, November 3, 2009

गुलामगिरी: एक बेहद जरूरी किताब

♦ शेष नारायण सिंह

महात्मा गांधी की किताब हिंद स्वराज की शताब्दी के वर्ष में कई स्तरों पर उस किताब की चर्चा हो रही है, जो जायज भी है। महात्मा जी की इसी किताब ने सत्याग्रह और अहिंसा को राजनीतिक विजय के एक हथियार के रूप में विकसित करने की प्रेरणा दी और 1920 से 1947 तक की भारत की राजनीतिक यात्रा के पाथेय के रूप में हिंद स्वराज में बताये गये मंत्र अमर हो गये।

दरअसल हिंद स्वराज एक ऐसी किताब है, जिसने भारत के सामाजिक राजनीतिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया। बीसवीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों का सबसे ज़्यादा योगदान है, हिंद स्वराज का नाम उसमें सर्वोपरि है। इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैं, भीमराव अंबेडकर की जाति का विनाश मार्क्‍स और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो, ज्योतिराव फुले की गुलामगिरी और वीडी सावरकर की हिंदुत्व। अंबेडकर, मार्क्‍स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है। क्योंकि मार्क्‍स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी का, सावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन समाज पार्टी का आधार है लेकिन 19 वीं सदी के क्रांतिकारी चितंक और वर्णव्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले ज्योतिराव फुले के बारे में जानकारी की कमी है। ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म पुणे में हुआ था और उनके पिता पेशवा के राज्य में बहुत सम्माननीय व्यक्ति थे। लेकिन ज्योतिराव फुले अलग किस्म के इंसान थे। उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जो काम किया उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। उनका जन्म 1827 में पुणे में हुआ था, माता पिता संपन्न थे लेकिन महात्मा फुले हमेशा ही गरीबों के पक्षधर बने रहे। उनकी महानता के कुछ खास कार्यों का ज़‍िक्र करना ज़रूरी है।

1848 में शूद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना कर दी थी। आजकल जिन्हें दलित कहा जाता है, महात्मा फुले के लेखन में उन्हें शूद्रातिशूद्र कहा गया है। 1848 में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोलना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है। क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उन्होंने 1848 में ही मार्क्‍स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का प्रकाशन किया था। 1848 में यह स्कूल खोलकर महात्मा फुले ने उस वक्त के समाज के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया था। उनके अपने पिता गोविंदराव जी भी उस वक्त के सामंती समाज के बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। दलित लड़कियों के स्कूल के मुद्दे पर बहुत झगड़ा हुआ लेकिन ज्योतिराव फुले ने किसी की न सुनी। नतीजतन उन्हें 1849 में घर से निकाल दिया गया। सामाजिक बहिष्कार का जवाब महात्मा फुले ने 1851 में दो और स्कूल खोलकर दिया। जब 1868 में उनके पिताजी की मृत्यु हो गयी तो उन्होंने अपने परिवार के पीने के पानी वाले तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया। 1873 में महात्मा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की और इसी साल उनकी पुस्तक गुलामगिरी का प्रकाशन हुआ। दोनों ही घटनाओं ने पश्चिमी और दक्षिण भारत के भावी इतिहास और चिंतन को बहुत प्रभावित किया।

महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है। वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं। उनका विश्वास था कि अपने एकाधिकार को स्थापित किये रहने के उद्देश्य से ही ब्राह्मणों ने श्रुति और स्मृति का आविष्कार किया था। इन्हीं ग्रंथों के जरिये ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को दैवी रूप देने की कोशिश की। महात्मा फुले ने इस विचारधारा को पूरी तरह ख़ारिज़ कर दिया। फुले को विश्वास था कि ब्राह्मणवाद एक ऐसी धार्मिक व्यवस्था थी जो ब्राह्मणों की प्रभुता की उच्चता को बौद्घिक और तार्किक आधार देने के लिए बनायी गयी थी। उनका हमला ब्राह्मण वर्चस्ववादी दर्शन पर होता था। उनका कहना था कि ब्राह्मणवाद के इतिहास पर गौर करें तो समझ में आ जाएगा कि यह शोषण करने के उद्देश्य से हजारों वर्षों में विकसित की गयी व्यवस्था है। इसमें कुछ भी पवित्र या दैवी नहीं है। न्याय शास्त्र में सत की जानकारी के लिए जिन 16 तरकीबों का वर्णन किया गया है, वितंडा उसमें से एक है। महात्मा फुले ने इसी वितंडा का सहारा लेकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को समाप्त करने की लड़ाई लड़ी। उन्होंने अवतार कल्पना का भी विरोध किया। उन्होंने विष्णु के विभिन्न अवतारों का बहुत ही ज़ोरदार विरोध किया। कई बार उनका विरोध ऐतिहासिक या तार्किक कसौटी पर खरा नहीं उतरता लेकिन उनकी कोशिश थी कि ब्राह्मणवाद ने जो कुछ भी पवित्र या दैवी कह कर प्रचारित कर रखा है उसका विनाश किया जाना चाहिए। उनकी धारणा थी कि उसके बाद ही न्याय पर आधारित व्यवस्था कायम की जा सकेगी। ब्राह्मणवादी धर्म के ईश्वर और आर्यों की उत्पत्ति के बारे में उनके विचार को समझने के लिए ज़रूरी है कि यह ध्यान में रखा जाए कि महात्मा फुले इतिहास नहीं लिख रहे थे। वे सामाजिक न्याय और समरसता के युद्घ की भावी सेनाओं के लिए बीजक लिख रहे थे।

महात्मा फुले ने कर्म विपाक के सिद्घांत को भी ख़ारिज़ कर दिया था, जिसमें जन्म जन्मांतर के पाप पुण्य का हिसाब रखा जाता है। उनका कहना था कि यह सोच जातिव्यवस्था को बढ़ावा देती है इसलिए इसे फौरन ख़ारिज़ किया जाना चाहिए। फुले के लेखन में कहीं भी पुनर्जन्म की बात का खंडन या मंडन नहीं किया गया है। यह अजीब लगता है क्योंकि पुनर्जन्म का आधार तो कर्म विपाक ही है।

महात्मा फुले ने जाति को उत्पादन के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने और ब्राह्मणों के आधिपत्य को स्थापित करने की एक विधा के रूप में देखा। उनके हिसाब से जाति भारतीय समाज की बुनियाद का काम भी करती थी और उसके ऊपर बने ढांचे का भी। उन्होंने शूद्रातिशूद्र राजा, बालिराज और विष्णु के वामनावतार के संघर्ष का बार-बार ज़‍िक्र किया है। ऐसा लगता है कि उनके अंदर यह क्षमता थी कि वह सारे इतिहास की व्याख्या बालि राज-वामन संघर्ष के संदर्भ में कर सकते थे।

स्थापित व्यवस्था के खिलाफ महात्मा फुले के हमले बहुत ही ज़बरदस्त थे। वे एक मिशन को ध्यान में रखकर काम कर रहे थे। उन्होंने इस बात के भी सूत्र दिये, जिसके आधार पर शूद्रातिशूद्रों का अपना धर्म चल सके। वे एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। ब्राह्मणवाद के चातुर्वर्ण्‍य व्यवस्था को उन्होंने ख़ारिज़ किया, ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का, जिसके आधार पर वर्णव्यवस्था की स्थापना हुई थी, को फर्ज़ी बताया और द्वैवर्णिक व्यवस्था की बात की।

महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है। गरीबों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया। उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की। जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था। इस दौर के समाज सुधारकों में किसानों के बारे में विस्तार से सोच-विचार करने का रिवाज़ नहीं था लेकिन महात्मा फुले ने इस सबको अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया।

स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे। मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं। लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा। उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया।

फुले ने विवाह प्रथा में बड़े सुधार की बात की। प्रचलित विवाह प्रथा के कर्मकांड में स्त्री को पुरुष के अधीन माना जाता था लेकिन महात्मा फुले का दर्शन हर स्तर पर गैरबराबरी का विरोध करता था। इसीलिए उन्होंने पंडिता रमाबाई के समर्थन में लोगों को लामबंद किया, जब उन्होंने धर्म परिवर्तन किया और ईसाई बन गयीं। वे धर्म परिवर्तन के समर्थक नहीं थे लेकिन महिला द्वारा अपने फ़ैसले खुद लेने के सैद्घांतिक पक्ष का उन्होंने समर्थन किया।

महात्मा फुले की किताब गुलामगिरी बहुत कम पृष्ठों की एक किताब है, लेकिन इसमें बताये गये विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बहुत सारे आंदोलन चले। उत्तर प्रदेश में चल रही दलित अस्मिता की लड़ाई के बहुत सारे सूत्र गुलामगिरी में ढूंढ़े जा सकते है। आधुनिक भारत महात्मा फुले जैसी क्रांतिकारी विचारक का आभारी है।

(शेष नारायण सिंह। मूलतः इतिहास के विद्यार्थी। पत्रकार। प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया। 1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की। महात्‍मा गांधी पर काम किया। अब स्‍वतंत्र रूप से लिखने-पढ़ने के काम में लगे हैं। उनसे sheshji@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

Friday, October 2, 2009

पत्रकारों के पेट तक पहुँचती है लालगढ़ पुलिस की लात?



कोलकाता की पत्रकार बिरादरी उबल रही है, पर दिल्ली में चुप्पी छाई है। एकाध अनुरंजन झा (भड़ास4मीडिया) और अविनाश (मोहल्ला लाइव) को छोड़ दें तो ब्लॉगों पर भी यह सवाल लोगों को मथता नजर नहीं आ रहा। उल्टे यह सवाल उछल रहा है कि जब पत्रकार पुलिस के वेश में या किसी और वेश में खबरें निकाल सकते हैं तो पुलिसवाले पत्रकार का वेश धर कर किसी नक्सली को क्यो नहीं पकड़ सकते?


पहली बात तो यह कि हम किसी पत्रकार, डॉक्टर, गुंडा, आतंकी या नक्सली के आचरण की तुलना पुलिस कार्रवाई से नहीं कर सकते। किसी गुंडे की गोली से एक व्यक्ति का मरना और पुलिस की गोली से मरना - एक जैसी बात नहीं है। पुलिस मौजूदा शासन व्यवस्था का सबसे संगठित हिस्सा है। यही वह ताकत है जिसके जरिए मौजूदा शासन व्यवस्था संचालित होती है।

कहा जा सकता है कि पुलिस वाले भी इंसान होते हैं और उन पर भी काम का वैसा ही बोझ होता है जैसा पत्रकारों पर या किसी भी अन्य पेशे के लोगों पर होता है। बात सही है, लेकिन इसी वजह से यह और भी जरूरी हो जाता है कि शासन व्यवस्था के अन्य संबद्ध हिस्से पुलिस पर अंकुश बनाए रखें। क्योंकि काम के बोझ तले पुलिस में यह स्वाभाविक रुझान होता है कि वह अन्य हिस्सों को अपनी जरूरत के मुताबिक निर्देशित करने की कोशिश करे।


कुछ दिनों पहले नक्सलियों के ही मसले पर इससे मिलती-जुलती सी बहस आंध्र प्रदेश में भी उठी थी। तब आंध्र पुलिस ने पत्रकारों को सलाह दी थी कि वे नक्सली नेताओं से इंटरव्यू न लें, बल्कि अगर उनके पास नक्सली नेताओं के बारे में कोई सूचना हो तो वे पुलिस को दें।

आध्र के पत्रकारों ने इस सलाह पर कड़ा एतराज जाहिर करते हुए कहा था कि हम पुलिस के इन्फोर्मेर नही हैं। पत्रकार का काम पुलिस को नही बल्कि जनता को इन्फोर्म करना होता है। इसीलिये बेहतर यही होगा की पुलिस नक्सलियों को पकड़ने का अपना काम करे और पत्रकारों को अपना काम करने दे।


यही वह बिन्दु है जो पत्रकारों को पुलिस से बुनियादी तौर पर अलग करता है। पुलिस इस तंत्र का एक हिस्सा है जिसका काम इस व्यवस्था को बनाए रखने में मदद करना है। वह सरकार के अधीन होती है, सरकार से ताकत लेती है। इसके विपरीत पत्रकार जनता से ताकत लेते हैं। लोकतंत्र में संप्रभुता जनता में निहित होती है और पत्रकार सीधे जनता को रिपोर्ट करते हैं। इसीलिये सरकार की नाराजगी से उनकी सेहत पर ख़ास फर्क नही पङता।

अरुण शौरी जैसे पत्रकार अगर प्रधान मंत्री की नाराजगी मोल लेते हुए भी शान से पत्रकारिता करते रहे तो उसका कारण यही है की जनता ने उनको मान्यता दी और तत्कालीन सरकार की मर्जी के ख़िलाफ़ दी।
यही बात मौजूदा विवाद पर भी लागू होती है।

सवाल यह नही है कि छत्रधर महतो कितने अच्छे या बुरे हैं और उन्हें पुलिस को पकड़ना चाहिए या नही। उस बारे में फ़ैसला करना अदालत का काम है। यहाँ सवाल यह है कि छत्रधर महतो या उन जैसे लोगो का जो भी कहना है वह सही है या ग़लत इसका अन्तिम फ़ैसला कौन करेगा? ख़ास कर ऐसे विचारधारात्मक मसलों का अन्तिम फ़ैसला सरकार या सरकारी तंत्र के विवेक पर नही छोड़ा जा सकता। लोकतंत्र में, आपको अच्छा लगे या बुरा, पर इसका अन्तिम फ़ैसला जनता के ही पास होता है। वह मौजूदा सरकार ही नही संविधान तक के भविष्य पर विचार करके फैसला कर सकती है।

लेकिन जब तक जनता ऐसा फ़ैसला नही करती तब तक जनता के नाम पर अराजकता फैलाने की भी छूट किसी को नही दी जा सकती। इसीलिये यह व्यवस्था की गयी है कि पुलिस समेत शासन के तमाम अंग अपना काम करते रहें और पत्रकार भी इन तमाम चीजो के बारे में जनता को रिपोर्ट करते रहें।


समस्या तब पैदा होती है जब शासन या इसका कोई अंग (जैसे पुलिस) पत्रकारों को स्वतंत्र तरीके से अपना काम करने से रोकने की कोशिश करता है या अपनी वजहों से इसमे बाधा खड़ी कर देता है।

छत्रधर महतो काण्ड इसी का उदाहरण है जिसमे पुलिस ने पत्रकार के वेश में छत्रधर महतो से संपर्क किया और उसे गिरफ्तार कर लिया। हैरत की बात यह है कि पश्चिम बंगाल के अधिकारी यह मानते हुए भी कि इससे पत्रकारों का काम मुश्किल हुआ है, इसे हंसी में टाल रहे हैं। एक बड़े अधिकारी ने चलताऊ ढंग से पत्रकारों को यह नसीहत दी कि कुछ दिनों तक आप फ़ोन पर बात करके काम चला लें, बाद में जब यह मसला हल हो जाएगा तब फ़िर से इंटरव्यू लेना शुरू कर दीजियेगा।


जब राज्य शासन के सर्वोच्च स्तर पर बैठे अफसर ऐसे मामलो में इतने चलताऊ कमेन्ट कर सकते हैं तो निचले स्तर पर पुलिस अफसरों से भला संवेदनशीलता की उम्मीद कैसे की जा सकती है?


मगर शासन और पुलिस की बात भी बाद में आती है। फिलहाल (कम से कम दिल्ली में) तो हम पत्रकारों को ही यह बात ठीक से समझनी होगी कि यह किसी ख़ास विचारधारा का सवाल नहीं है। यह मामला पत्रकारिता का है, इस बात का है कि पत्रकारों के स्वतंत्र रूप से काम करने की गुंजाइश बनी रहेगी या नही। इसीलए चुप्पी घातक हो सकती है।

Tuesday, September 1, 2009

वक्त बदल गया है, आप भी बदलिए!

प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,

मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की होंगी। अब आप जाति पर अपने शर्मसार करने वाले विचारों को अपने रिश्तेदारों पर लागू करके देखिए और हिसाब लगाइए कि कौन सी बच्ची या बच्चा कवि बनेगा और कौन कहानीकार और कौन आत्मकथा बेहतर लिखेगा। या हिसाब लगाइए इस बात का कि कौन बैटिंग करेगा और कौन बॉलिंग और कौन टिक कर खेलेगा और कौन टिक कर नहीं खेलेगा या फिर कौन बेहतर नेतृत्व क्षमता दिखाएगा और कौन नहीं दिखाएगा। आपको अपने ही विचारों से शायद नफरत होने लगे और आप अपने बच्चों और पोते-पोतियों से माफी मांगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाएं। बड़े लोग जब इस तरह अश्लील और समाज में नफरत फैलाने वाली बातें करने लगें, तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है।

मैं ये सोचने की कोशिश कर रहा हूं कि ये दोनों बुज़ुर्ग बीमार क्यों हैं। इसका एक कारण तो मुझे समझ में आ रहा है। इन्हें दुनिया की शायद खबर ही नहीं है। प्रभाष जोशी इंटरनेट नहीं देखते। वो ऑर्कुट पर नहीं हैं। वो फेसबुक में भी नहीं हैं। मुझे नहीं मालूम कि उनके पास ई-मेल आईडी है या नहीं। कुछ समय पहले तक उनके पास मोबाइल फोन भी नहीं था। एसएमएस पता नहीं वो करते हैं या नहीं। वो ट्विटर पर ट्विट भी नहीं करते। उनका कोई ब्लॉग भी नहीं है। राजेंद्र यादव का भी कमोबेश यही हाल है। वैसे तो इस गरीब देश के ज्यादातर लोगों की प्रोफाइल नेटवर्किंग साइट पर नहीं हैं, वो ईमेल भी नहीं करते, न ही कंप्यूटर से उनका कोई वास्ता है। देश में इस समय लगभग 6 करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं (देखें मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी की सालाना रिपोर्ट)। तो अगर राजेंद्र यादव या प्रभाष जोशी देश के छह करोड़ कनेक्टेड लोगों में नहीं हैं तो क्या फर्क पड़ता है?

फर्क पड़ता है। इसलिए क्योंकि ये दोनों कम्युनिकेशन यानी संवाद के धंधे में हैं। और ऐसे लोग अगर दीन-दुनिया से अपडेट न रहें तो फर्क पड़ता है। ये बेखबर लोग अगर अपनी बात खुद तक ही रखें तो हमें धेले भर की परवाह नहीं। लेकिन वो बोल रहे हैं और बेहद बेतुका और बेहूदा बोल रहे हैं। ये दोनों लोग ऐसी बातें बोल रहे हैं, जो उनके चेलों के अलावा हर किस को अखर रही है। मैं एक भी ऐसे आदमी को नहीं जानता, जो जातिवाद के समर्थन में उनके विचारों का कम से कम सार्वजनिक तौर पर समर्थन करें। इन दोनों महान लोगों के चेलों के पास भी बचाव में देने को कोई तर्क नहीं हैं। आखिर इनके चेलों में से भी कई ने जाति से बाहर शादी की है। उन्हें मालूम है कि उनकी अगली पीढ़ी क्या करने वाली है। हर जाति के लोगों को ये लेखन आउटडेटेड और सड़ा हुआ लग रहा है। 21वीं सदी के लगभग 10 साल बीतने के बाद ये अज्ञानी लेखन हमारी देवभाषा में ही संभव है। इस समय पश्चिम में आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई जाति या वर्ण या नस्ल या रंग के आधार पर श्रेष्ठता का ऐसा खुल्लमखुल्ला और अश्‍लील समर्थन करे। उसे पूरा देश दौड़ा लेगा।

बहरहाल ये इस बात का प्रमाण है कि ये दोनों लोग दुनिया में चल रहे आधुनिक विमर्श से वाकिफ ही नहीं हैँ। ये महानगर में रहते हैं। आर्थिक रूप से समर्थ हैं। लेकिन नेट पर नहीं हैं। पता नहीं की-बोर्ड पर काम करना इन्हें आता भी है या नहीं। ऐसे में दोनों को पता ही कैसे चलेगा कि नॉम चॉमस्की ने अपने ब्लॉग पर ताजा क्या लिखा है या फिर फ्रांसिस फुकोयामा के बारे में ब्लॉग में क्या चल रहा है। उन्हें पता ही नहीं कि दुनिया कितनी बदल गयी है। नहीं, ये एलीट होने या जेब में ढेर सारे पैसे होने की बात नहीं है। 10 रुपये में कोई भी आदमी आधे से लेकर एक घंटे तक इंटरनेट कैफे में कनेक्ट हो सकता है। प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव भी ये कर सकते हैं। वो ऐसा नहीं करते, इस वजह से उनका अपने पाठकों की दुनिया से जबर्दस्त डिस्कनेक्ट है।

भारत में इतने हमलावर आये हैं (उनमें से ज्यादातर अपने साथ परिवार लेकर नहीं आये) और समाज व्यवस्था में इतनी उथल-पुथल हुई है कि रक्त शुद्धता की बात कोई कूढ़मगज इंसान ही कर सकता है। हिमालय के किसी बेहद दुर्गम गांव में या किसी द्वीप या किसी बीहड़ जंगल में बसी बस्ती के अलावा रक्त अब शायद ही कहीं शुद्ध बचा होगा। ऐसे में कोई ये कहे कि कोई खास जाति किसी खास काम को करने में इसलिए ज्यादा सक्षम और समर्थ है कि उसका जन्म किसी खास जाति में हुआ है, तो इस पर आप हंसने के अलावा क्या कर सकते हैं। आप रो भी सकते हैं कि जिन लोगों को हिंदी भाषा ने नायक कह कर सिर पर बिठाया है, उनकी मेधा का स्तर ये है।

प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, क्या आपको अपने घरों में नयी पीढ़ी की हंसी की आवाज़ सुनाई दे रही है? पता लगाइए कि कहीं वो आप पर तो नहीं हंस रहे हैं।

प्रभाष जोशी तो खुद को ब्राह्मण ही मानते होंगे। उनमें वो सारे गुण होंगे, जिनका जिक्र उन्होंने ब्राह्मणों के बारे में अपने इंटरव्यू में किया है। अगर उनका जन्म मिथिलांचल या मालवा के किसी बेहद गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ होता, तो भी क्या ये तय था कि वो संपादक ही बनते। इस बात की काफी संभावना है कि वो पटना या इंदौर के किसी सरकारी दफ्तर में चपरासी होते और लोगों को पानी पिला रहे होते। राजेंद्र यादव किस जातीय गुण की वजह से संपादक बन गये?

तो प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,

बात सिर्फ इतनी सी है कि किसी को कितना मौका मिला है। बात अवसर की है। ये न होता तो आप अपने बच्चों को किसी गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते। फिर हम भी देखते धारण क्षमता का चमत्कार। यादव जी का ये कहना गलत है कि “ब्राम्हणों में कुछ चीज़ें से अभ्यास आयी हैं जैसे कि अमूर्तन पर विचार-मनन और इसीलिए कविताई में उनका वर्चस्व है। इन्हीं वजहों से विश्वविद्यालयों और अकादमियों में भी वे काबिज़ हैं।” वो वहां काबिज इसलिए हैं, क्योंकि उन्हें वहां तक पहुंचने का मौका मिला है। पढ़ाई-लिखाई को लेकर चेतना अलग-अलग जातियों और समूहों में कुछ जादू नेटवर्किंग का भी है। नरेंद्र जाधव और बीएल मुणगेकर को मौका मिला तो दलित होते हुए भी वो पुणे और मुंबई जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में कुलपति बन गये। कोई भी बन सकता है।

किसी जाति में कोई अलग गुण नहीं होता। कुछ पुरानी बातें अब लागू नहीं होतीं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने गीता का भाष्य करते हुए 18वें अध्याय में यही कहा है। पढ़ लीजिएगा। 21वीं सदी में जातीय श्रेष्ठता की बात करेंगे तो घृणा के नहीं हंसी के पात्र बनेंगे।

ये वक्त के साथ खुद को बदल नहीं पाए!

प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,

मेरे करीबी रिश्तेदारों में कई जातियों के लोग हैं। ब्राह्मण से लेकर कायस्थ और नायर से लेकर दलित तक। ये सभी सभी परिवार प्रेम से रह रहे हैं। आपके परिवारों में भी लोगों ने प्रेम किया होगा और कई ने जाति से बाहर शादियां भी की होंगी। अब आप जाति पर अपने शर्मसार करने वाले विचारों को अपने रिश्तेदारों पर लागू करके देखिए और हिसाब लगाइए कि कौन सी बच्ची या बच्चा कवि बनेगा और कौन कहानीकार और और कौन आत्मकथा बेहतर लिखेगा। या हिसाब लगाइए इस बात का कि कौन बैटिंग करेगा और कौन बॉलिंग और कौन टिक कर खेलेगा और कौन टिककर नहीं खेलेगा या फिर कौन बेहतर नेतृत्व क्षमता दिखाएगा और कौन नहीं दिखाएगा। आपको अपने ही विचारों से शायद नफरत होने लगे और आप अपने बच्चों और पोते-पोतियों से माफी मांगने के अलावा कुछ और नहीं कर पाएं। बड़े लोग जब इस तरह अश्लील और समाज में नफरत फैलाने वाली बातें करने लगें तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है।

मैं ये सोचने की कोशिश कर रहा हूं कि ये दोनों बुजुर्ग बीमार क्यों हैं। इसका एक कारण तो मुझे समझ में आ रहा है। इन्हें दुनिया की शायद खबर ही नहीं है। प्रभाष जोशी इंटरनेट नहीं देखते। वो ऑर्कुट पर नहीं हैं। वो फेसबुक में भी नहीं हैं। मुझे नहीं मालूम कि उनके पास ई-मेल आईडी है या नहीं। कुछ समय पहले तक उनके पास मोबाइल फोन भी नहीं था। एसएमएस पता नहीं वो करते हैं या नहीं। वो ट्विटर पर ट्विट भी नहीं करते। उनका कोई ब्लॉग भी नहीं है। राजेंद्र यादव का भी कमोबेस यही हाल है। वैसे तो इस गरीब देश के ज्यादातर लोगों के प्रोफाइल नेटवर्किंग साइट पर नहीं हैं, वो ईमेल भी नहीं करते, न ही कंप्यूटर से उनका कोई वास्ता है। देश में इस समय लगभग 6 करोड़ लोग ही इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं (देखें मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी की सालाना रिपोर्ट)। तो अगर राजेंद्र यादव या प्रभाष जोशी देश के छह करोड़ कनेक्टेड लोगों में नहीं हैं तो क्या फर्क पड़ता है?

फर्क पड़ता है। इसलिए क्योंकि ये दोनों कम्युनिकेशन यानी संवाद के धंधे में हैं। और ऐसे लोग अगर दीन-दुनिया से अपडेट न रहें तो फर्क पड़ता है। ये बेखबर लोग अगर अपनी बात खुद तक ही रखें तो हमें धेले भर की परवाह नहीं। लेकिन वो बोल रहे हैं और बेहद बेतुका और बेहूदा बोल रहे हैं। ये दोनों लोग ऐसी बातें बोल रहे हैं जो उनके चेलों के अलावा हर किस को अखर रही है। मैं एक भी ऐसे आदमी को नहीं जानता जो जातिवाद के समर्थन में उनके विचारों का कम से कम सार्वजनिक तौर पर समर्थन करें। इन दोनों महान लोगों के चेलों के पास भी बचाव में देने को कोई तर्क नहीं हैं। आखिर इनके चेलों में से भी कई ने जाति से बाहर शादी की है। उन्हें मालूम है कि उनकी अगली पीढ़ी क्या करने वाली है। हर जाति के लोगों को ये लेखन आउटडेटेड और सड़ा हुआ लग रहा है। 21वीं सदी के लगभग 10 साल बीतने के बाद ये अज्ञानी लेखन हमारी देवभाषा में ही संभव है। इस समय पश्चिम में आप कल्पना नहीं कर सकते कि कोई जाति या वर्ण या नस्ल या रंग के आधार पर श्रेष्ठता का ऐसा खुल्लमखुल्ला और अश्लील समर्थन करे। उसे पूरा देश दौड़ा लेगा।

बहरहाल ये इस बात का प्रमाण है कि ये दोनों लोग दुनिया में चल रहे आधुनिक विमर्श से वाकिफ ही नहीं हैँ। ये महानगर में रहते है। आर्थिक रूप से समर्थ हैं। लेकिन नेट पर नहीं है। पता नहीं की-बोर्ड पर काम करना इन्हें आता भी है या नहीं। ऐसे में दोनों को पता ही कैसे चलेगा कि नॉम चॉमस्की ने अपने ब्लॉग http://www.zmag.org/blog/noamchomsky पर ताजा क्या लिखा है या फिर फ्रांसिस फुकोयामा के बारे में ब्लॉग में क्या चल रहा है http://en.wordpress.com/tag/francis-fukuyama/। उन्हें पता ही नहीं कि दुनिया कितनी बदल गई है। नहीं, ये एलीट होने या जेब में ढेर सारे पैसे होने की बात नहीं है। 10 रुपए में कोई भी आदमी आधे से लेकर एक घंटे तक इंटरनेट कैफे में कनेक्ट हो सकता है। प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव भी ये कर सकते हैं। वो ऐसा नहीं करते इस वजह से उनका अपने पाठकों की दुनिया से जबर्दस्त डिस्कनेक्ट हैं।

भारत में इतने हमलावर आए हैं (उनमें से ज्यादातर अपने साथ परिवार लेकर नहीं आए) और समाज व्यवस्था में इतनी उथल पुथल हुई है कि रक्त शुद्धता की बात कोई कूढ़मगज इंसान ही कर सकता है। हिमालय के किसी बेहद दुर्गम गांव में या किसी द्वीप या किसी बीहड़ जंगल में बसी बस्ती के अलावा रक्त अब शायद ही कहीं शुद्ध बचा होगा। ऐसे में कोई ये कहे कि कोई खास जाति किसी खास काम को करने में इसलिए ज्यादा सक्षम और समर्थ है कि उसका जन्म किसी खास जाति में हुआ है तो इस पर आप हंसने के अलावा क्या कर सकते हैं। आप रो भी सकते हैं कि जिन लोगों को हिंदी भाषा ने नायक कहकर सिर पर बिठाया है, उनकी मेधा का स्तर ये है।

प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव, क्या आपको अपने घरों में नई पीढ़ी की हंसी की आवाज सुनाई दे रही है। पता लगाइए कि कहीं वो आप पर तो नहीं हंस रहे हैं।

प्रभाष जोशी तो खुद को ब्राह्मण ही मानते होंगे। उनमें वो सारे गुण होंगे जिनका जिक्र उन्होंने ब्राह्मणों के बारे में अपने इंटरव्यू में किया है। अगर उनका जन्म मिथिलांचल या मालवा के किसी बेहद गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ होता तो भी क्या ये तय था कि वो संपादक ही बनते। इस बात की काफी संभावना है कि वो पटना या इंदौर के किसी सरकारी दफ्तर में चपरासी होते और लोगों को पानी पिला रहे होते। राजेंद्र यादव किस जातीय गुण की वजह से संपादक बन गए?


तो प्रभाष जोशी और राजेंद्र यादव,

बात सिर्फ इतनी सी है कि किसी को कितना मौका मिला है। बात अवसर की है। ये न होता तो आप अपने बच्चों को किसी गांव के सरकारी स्कूल में पढ़ाते। फिर हम भी देखते धारण क्षमता का चमत्कार। यादव जी का ये कहना गलत है कि “ब्राम्हणों में कुछ चीज़ें से अभ्यास आई हैं जैसे कि अमूर्तन पर विचार-मनन और इसीलिए कविताई में उनका वर्चस्व है। इन्हीं वजहों से विश्वविद्यालयों और अकादमियों में भी वे काबिज़ हैं। “ वो वहां काबिज इसलिए हैं क्योंकि उन्हें वहां तक पहुंचने का मौका मिला है। पढ़ाई लिखाई को लेकर चेतना अलग अलग जातियों और समूहों में कुछ जादू नेटवर्किंग का भी है। नरेंद्र जाधव और बीएल मुणगेकर को मौका मिला तो दलित होते हुए भी वो पुणे और मुंबई जैसे बड़े विश्वविद्यालयों में कुलपति बन गए। कोई भी बन सकता है।

किसी जाति में कोई अलग गुण नहीं होता। कुछ पुरानी बातें अब लागू नहीं होतीं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन मे गीता का भाष्य करते हुए 18वें अध्याय में यही कहा है। पढ़ लीजिएगा। 21वीं सदी में जातीय श्रेष्ठता की बात करेंगे तो घृणा के नहीं हंसी के पात्र बनेंगे।

Saturday, August 22, 2009

क्रिकेट के मैदान में अधूरा भारत क्यों दिखता है?

दिलीप मंडल

विनोद कांबली का टीम से बाहर होना क्या किसी नस्लभेदी या जातिवादी साजिश की वजह से हुआ था? एक टीवी कार्यक्रम में इस ओर संकेत कर विनोद कांबली ने बेहद संवेदनशील मुद्दा छेड़ दिया। लेकिन एक व्यक्ति के टीम में होने या न होने या निकाले जाने से बड़ा एक मुद्दा है, जिसपर बात होनी चाहिए। वो है क्रिकेट के मैदान में पूरे देश की इमेज नजर न आना। आखिर ये शायद अकेला टीम स्पोर्ट है जिसकी भारतीय टीम में नॉर्थ ईस्ट से कोई नहीं होता, कोई आदिवासी नहीं होता, कोई दलित नहीं होता, पिछड़े जाति समूहों के खिलाड़ी आम तौर पर नदारद होते हैं। यानी तीन चौथाई से ज्यादा हिंदुस्तान भारतीय क्रिकेट टीम में नजर ही नहीं आता। और ये साल दर साल से चला आ रहा है।

24 साल की उम्र में विनोद कांबली की टेस्ट क्रिकेट से विदाई से कुछ असहज सवाल तो खड़े होते ही हैं। विनोद कांबली ने 1992-93 में इंग्लैंड के खिलाफ सिरीज से टेस्ट करियर की शुरुआत की और उन्होंने 17 मैचों में 1084 रन बनाए। उन्होंने इस दौरान 4 सेंचुरी और 3 हाफ सेंचुरी बनाई। उनका टॉप स्कोर 227 रहा और बैटिंग एवरेज रहा 54.20 (सचिन तेंडुलकर का एवरेज है 54.58)। आखिर के चंद टेस्ट मैच में कांबली जरूर ढलान पर रहे। लेकिन अगर अजित आगरकर लगातार पांच टेस्ट इनिंग्स मे जीरो बनाकर भी इंडियन टीम में रह सकते हैं और कई खिलाड़ियों (सचिन और गांगुली समेत) की खराब फॉर्म के बाद टीम में वापसी होती रही है तो ये सवाल उठता ही है कि कांबली जैसे टैलेंटेड खिलाड़ी को प्रदर्शन सुधारने का टेस्ट मैच में एक भी मौका क्यों नहीं मिला। तेज शॉर्ट पिच गेंदों को खेलने की उनकी जिस कमजोरी की बात की जाती है वो तो गांगुली समेत देश के कई बैट्समैन के साथ रही है। तकनीक में सुधार का मौका मिलने में कई बैट्समैन ने इस कमजोरी को सुधार भी लिया। ये सुविधा कांबली को नहीं मिली और इसे ही संभवत: वो भेदभाव कह रहे हैं।

बहरहाल विनोद कांबली की टीम से विदाई के बाद ये सवाल एक बार फिर सामने आ गया है कि भारतीय टीम में पूरा भारत क्यों नहीं दिखता। ऑस्ट्रेलिया के एक खेल पत्रकार ने साइमंड्स और हरभजन विवाद के समय भारतीय क्रिकेट में ब्राह्मण वर्चस्व के बारे में पूछा था तो क्रिकेट जगत में जबर्दस्त विवाद खड़ा हो गया था। किसी को ये सवाल जातिवादी, सैक्टेरियन, विभाजनकारी और मॉडर्निटी विरोधी लग सकती है लेकिन ऐसी बहस तो इस समय लगभग पूरी दुनिया में चल रही है और लगभग सभी विकसित देश एक के बाद एक ये मान रहे हैं कि राष्ट्र की विविधता राष्ट्रजीवन के तमाम अंगों में उसी खूबसूरती से नजर आना देश और नागरिकों के हित में है।

ऐसे देशों में अमेरिका (जहां अब एक अश्वेत राष्ट्रपति है), फ्रांस, कैनेडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं। ये सभी देश डायवर्सिटी को अपना रहे हैं। ब्रिटेन की क्रिकेट टीम में चेन्नई का जन्मा एक मुसलमान नासिर हुसैन कैप्टन बनता है और फ्रांस अपनी फुटबॉल टीम की कमान अफ्रीकी मूल के जिनाडिन जिडान को सौंप सकता है। हॉलैंड की फुटबॉल टीम में लगभग आधा दर्जन अश्वेत नजर आते हैं। एक और मिसाल के तौर पर साउथ अफ्रीका की क्रिकेट टीम को ही लीजिए। वहां के क्रिकेट बोर्ड के डायवर्सिटी प्लान के तहत टीम में लगभग आधे खिलाड़ी ब्लैक या मिली जुली नस्ल के होते हैं और इसमें भारत समेत एशियाई मूल के खिलाड़ी भी शामिल हैं।

नहीं ये कोई कोटा सिस्टम नहीं है। अगर वंचित तबकों को आगे लाने का मतलब मेरिट की अनदेखी होता, तो फ्रांस और हॉलैंड की फुटबॉल टीम कमजोर टीमों की गिनती में आती और साउथ अफ्रीका की क्रिकेट टीम दुनिया की सबसे कमजोर टीम होती। लेकिन ऐसा नहीं है। अश्वेतों की भागीदारी ने साउथ अफ्रीका की टीम को कमजोर नहीं किया। आईसीसी की वन डे रैंकिंग में फिलहाल वह नंबर वन है। हमें ये भी नहीं भूलना चाहिए कि 1983 में जिस क्रिकेट टीम में विश्वकप जीता था, उसमें भारतीय समाज की विविधता शायद अब तक सबसे बेहतरीन शक्ल में नजर आई थी। दरअसल खेल में डायवर्सिटी का एक ही मतलब है और वो है टैलेंट पूल को बड़ा करना और ज्यादा से ज्यादा लोगों तो खेलों को ले जाना। क्रिकेट तो वैसे भी 12 देशों का खेल है। अगर भारत को स्पोर्ट्स सुपरपावर बनना है, ओलिंपिक्स में मेडल लाने हैं तो देश में टैलेंट पूल को कई गुना बढ़ाना होगा।

अब जबकि आईपीएल के रूप में इतना अधिक क्रिकेट खेला जा रहा है और इतने ज्यादा खिलाड़ी मैदान में हैं कि टैलेंट को दबा पाना आज उस तरह संभव नहीं है जैसा कि आज से 20 या 50 साल पहले हो सकता था। आज तो किसी छोटे शहर का धोनी, प्रवीण कुमार, हरभजन सिंह या आरपी सिंह तमाम बाधाओं को पार कर टीम में जगह बना लेता है। साधारण परिवार से आने वाले अमित मिश्रा के टेलेंट की अनदेखी आज मुश्किल है।

इसके बावजूद क्रिकेट में अगर हॉकी या फुटबॉल या एथेलेटिक्स जैसी विविधता वाली टीम नजर नहीं आती तो इसकी वजह क्रिकेट के इतिहास और इस खेल के स्वरूप में है। आजादी से पहले तक क्रिकेट टीम में ज्यादातर राजा-महाराजा हुआ करते थे। उसके बाद भी क्रिकेट जिमखाना संस्कृति से अरसे तक मुक्त नहीं हुआ। साथ ही क्रिकेट का एक और केंद्र वो स्कूल और कॉलेज रहे जहां अच्छे मैदान थे, नेट पर क्रिकेट के गुर सिखाने वाले अच्छे कोच थे और इन स्कूलों में प्रवेश हर किसी को नहीं मिल सकता था। इसलिए क्रिकेट का एक एलीट चरित्र हमेशा से रहा।

क्रिकेट के बारे में कई समाजशास्त्रियों ने ये बात लिखी है कि ये खेल मूल रूप से भारतीय स्वभाव के अनुकूल है। इसमें शारीरिक संपर्क न्यूनतम है और ये छुआछूत मानने वाली भारतीय जाति परंपरा के भी हिसाब से फिट खेल है।

लेकिन वक्त के साथ क्रिकेट भी बदल रहा है। अब ट्वेंटी-ट्वेंटी फॉर्मेट में स्टैमिना का महत्व काफी बढ़ गया है। खेल का चरित्र बदलने के साथ ही खेलने वाले भी बदल रहे हैं। कांबली की शिकायत उनके समय के हिसाब से सही हो भी सकती है लेकिन 2009 के भारतीय क्रिकेट के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। आने वाले दिनों में किसी कांबली को शायद ये शिकायत करने का मौका नहीं मिलेगा कि जाति की वजह से उसे टीम से निकाल दिया गया
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